➤ सांसद-विधायकों के पत्र अब फाइलों में दबाना आसान नहीं, ऑनलाइन होगी हर VIP संदर्भ की निगरानी
➤ PMO की नई डिजिटल व्यवस्था में विभागों को समयबद्ध जवाब और कार्रवाई रिपोर्ट अपलोड करनी होगी
➤ हिमाचल में 1 सितंबर से लागू VLMS, देरी होने पर सिस्टम खुद भेजेगा रिमाइंडर और अलर्ट
हिमाचल प्रदेश में सांसदों, विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों की ओर से भेजे जाने वाले पत्रों और जनहित से जुड़े संदर्भों को महीनों तक लंबित रखना अब अधिकारियों के लिए आसान नहीं होगा। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने VIP Letter Management System (VLMS) लागू किया है, जिसके तहत जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए मामलों की ऑनलाइन निगरानी की जाएगी। संबंधित विभागों को न केवल इन मामलों पर कार्रवाई करनी होगी, बल्कि कार्रवाई रिपोर्ट और स्टेटस अपडेट भी ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने भी इस डिजिटल व्यवस्था को 1 सितंबर 2026 से लागू कर दिया है। प्रशासनिक सुधार विभाग की ओर से जारी निर्देशों के बाद सभी प्रशासनिक सचिवों, विभागाध्यक्षों, उपायुक्तों, मंडलायुक्तों और बोर्ड-निगमों को पीएम-आरईएफ पोर्टल के माध्यम से VIP मामलों की ऑनलाइन रिपोर्टिंग करने के लिए कहा गया है। नई व्यवस्था का मकसद जनप्रतिनिधियों के संदर्भों पर होने वाली कार्रवाई को समयबद्ध बनाना और उनकी स्थिति को लेकर बनी रहने वाली अस्पष्टता को खत्म करना है।
अब हर VIP संदर्भ की होगी डिजिटल ट्रैकिंग
अब तक सांसदों, विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों की ओर से भेजे गए पत्र अलग-अलग विभागों और अधिकारियों के स्तर पर फाइलों में लंबित रहते थे। कई बार संबंधित जनप्रतिनिधियों को यह पता लगाना भी मुश्किल होता था कि उनके पत्र पर किस स्तर पर कार्रवाई चल रही है और मामला आखिर किस अधिकारी के पास लंबित है।
नई व्यवस्था में हर VIP संदर्भ को डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम से जोड़ा जाएगा। संबंधित मंत्रालय, विभाग या राज्य सरकार को पत्र इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जाएंगे। इसके बाद संबंधित विभाग को मामले की स्थिति और उस पर की गई कार्रवाई का विवरण ऑनलाइन दर्ज करना होगा।
इससे किसी पत्र को लंबे समय तक बिना कार्रवाई के लंबित रखने की स्थिति में उसकी डिजिटल रिकॉर्डिंग उपलब्ध रहेगी। यानी अब यह पता लगाया जा सकेगा कि संदर्भ किस विभाग के पास है, उस पर क्या कार्रवाई हुई और जवाब कब दिया गया।
विभागों को ऑनलाइन अपलोड करनी होगी कार्रवाई रिपोर्ट
नई व्यवस्था के तहत केवल पत्र प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित विभाग को उस पर की गई कार्रवाई रिपोर्ट, जवाब और स्टेटस अपडेट ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड करने होंगे।
इस डिजिटल प्रक्रिया से जनप्रतिनिधियों के संदर्भों की प्रगति पर निगरानी रखना आसान होगा। किसी मामले में निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई नहीं होने पर सिस्टम की ओर से रिमाइंडर और अलर्ट जारी किए जाएंगे।
इस व्यवस्था का सीधा असर अधिकारियों की जवाबदेही पर पड़ने की उम्मीद है। पहले किसी फाइल के एक टेबल से दूसरे टेबल तक जाने में समय लगने और उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। अब डिजिटल रिकॉर्ड के कारण मामले की प्रगति को ऑनलाइन देखा जा सकेगा।
PMO स्तर तक दर्ज होगी मामलों की प्रगति
नई व्यवस्था की सबसे अहम बात यह है कि जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए मामलों की निगरानी PMO स्तर तक होगी। इसका मतलब यह है कि VIP संदर्भों के निपटारे की स्थिति को लेकर केंद्र स्तर पर भी डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
इससे विभागों पर समय पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ेगा। किसी संदर्भ पर कार्रवाई में देरी होने पर डिजिटल सिस्टम के जरिए उसकी जानकारी और रिमाइंडर सामने आएंगे। ऐसे में संबंधित अधिकारी के लिए मामले को लंबे समय तक लंबित रखना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है।
सरकार की ओर से इस व्यवस्था के जरिए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सामने आने वाले जनहित के मामलों को नजरअंदाज न किया जाए और उनके निस्तारण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बने।
हिमाचल में 1 सितंबर से लागू हुई व्यवस्था
हिमाचल प्रदेश में यह व्यवस्था 1 सितंबर 2026 से प्रभावी कर दी गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अतिरिक्त सचिव सुभाषीश पांडा की ओर से मुख्य सचिव केके पंत को भेजे गए पत्र के आधार पर राज्य में इसके कार्यान्वयन के निर्देश जारी किए गए हैं।
इसके बाद प्रशासनिक सुधार विभाग ने संबंधित अधिकारियों को पीएम-आरईएफ पोर्टल के माध्यम से VIP मामलों की ऑनलाइन रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
प्रशासनिक सचिवों से लेकर विभागाध्यक्षों, उपायुक्तों, मंडलायुक्तों और बोर्ड-निगमों तक के अधिकारियों को इस व्यवस्था के दायरे में रखा गया है। इसका उद्देश्य यह है कि जनप्रतिनिधियों से प्राप्त संदर्भ किसी एक विभाग या कार्यालय में लंबित रहने के बजाय उनकी डिजिटल निगरानी बनी रहे।
सांसद उठाते रहे हैं पत्रों पर कार्रवाई न होने का मुद्दा
हिमाचल में जनप्रतिनिधियों के पत्रों पर कार्रवाई नहीं होने का मुद्दा राजनीतिक तौर पर भी उठता रहा है। सांसदों की ओर से कई बार प्रदेश सरकार और विभिन्न विभागों पर उनके पत्रों तथा जनहित से जुड़े मामलों को नजरअंदाज करने के आरोप लगाए गए हैं।
बीते दिनों मंडी में दिशा की बैठक के दौरान सांसद कंगना रणौत ने भी इस तरह के मामलों को उठाया था। वहीं धर्मशाला में सांसद राजीव भारद्वाज ने भी जनप्रतिनिधियों की ओर से भेजे गए पत्रों पर कार्रवाई का मुद्दा उठाया था।
इसके अलावा सांसद अनुराग ठाकुर और सुरेश कश्यप भी इस मुद्दे को लेकर प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर हमलावर रहे हैं। भाजपा सांसदों की ओर से राज्य सरकार और विभिन्न विभागों पर उनके पत्रों तथा जनहित से जुड़े मामलों को नजरअंदाज करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
ऐसे राजनीतिक आरोपों के बीच नई डिजिटल व्यवस्था को जनप्रतिनिधियों के संदर्भों पर कार्रवाई की निगरानी मजबूत करने वाले कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
अब पता चलेगा पत्र किस स्तर पर अटका है
नई प्रणाली का एक बड़ा फायदा यह होगा कि किसी VIP संदर्भ की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक की जा सकेगी। जनप्रतिनिधियों की ओर से भेजा गया मामला संबंधित विभाग तक इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से पहुंचेगा और विभाग को उस पर की गई कार्रवाई का विवरण भी सिस्टम में दर्ज करना होगा।
इससे पत्र भेजने के बाद उसकी स्थिति को लेकर होने वाली अनिश्चितता कम हो सकती है। यदि कार्रवाई में देरी होती है तो सिस्टम से रिमाइंडर और अलर्ट जारी होने की व्यवस्था है। इससे अधिकारियों पर लंबित मामलों को निपटाने का दबाव बढ़ेगा।
खासकर ऐसे मामलों में जहां किसी क्षेत्र की सड़क, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, प्रशासनिक समस्या या अन्य जनहित के मुद्दे को सांसद या विधायक सरकार के समक्ष उठाते हैं, वहां इस प्रणाली से संदर्भ के निपटारे की स्थिति को रिकॉर्ड में रखना आसान होगा।
फाइलों से निकलकर डिजिटल सिस्टम में आएंगे VIP मामले
सरकार की इस नई व्यवस्था से VIP संदर्भों के कामकाज में एक तरह का डिजिटल बदलाव आएगा। पहले जहां पत्रों की कार्रवाई मुख्य रूप से विभागीय फाइलों और पत्राचार पर निर्भर रहती थी, वहीं अब डिजिटल ट्रैकिंग और ऑनलाइन स्टेटस अपडेट व्यवस्था का हिस्सा होंगे।
संबंधित विभाग को जवाब देने के साथ ही कार्रवाई रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड करनी होगी। इससे किसी मामले पर हुई कार्रवाई का रिकॉर्ड डिजिटल रूप में उपलब्ध रहेगा।
व्यवस्था के प्रभावी होने के बाद जनप्रतिनिधियों के लिए भी अपने संदर्भों की स्थिति जानना पहले की तुलना में आसान होने की उम्मीद है। वहीं अधिकारियों के लिए लंबित मामलों की निगरानी और समय पर जवाब देना प्रशासनिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगा।
जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम
VIP लेटर मैनेजमेंट सिस्टम लागू होने के बाद हिमाचल में सांसदों और विधायकों की ओर से भेजे जाने वाले संदर्भों के निस्तारण की प्रक्रिया में जवाबदेही और समयबद्धता बढ़ने की उम्मीद है। सरकार की ओर से जारी निर्देशों में प्रशासन के विभिन्न स्तरों को ऑनलाइन रिपोर्टिंग व्यवस्था से जोड़ा गया है।
इसका सबसे बड़ा असर उन मामलों पर पड़ सकता है जो लंबे समय तक कार्रवाई के इंतजार में विभागीय स्तर पर पड़े रहते हैं। अब डिजिटल रिकॉर्ड, स्टेटस अपडेट और रिमाइंडर व्यवस्था के कारण लंबित मामलों की स्थिति को छिपाना आसान नहीं होगा।
हालांकि नई व्यवस्था की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विभाग और अधिकारी पोर्टल पर जानकारी कितनी नियमितता और गंभीरता से अपडेट करते हैं। यदि डिजिटल रिकॉर्डिंग और समयबद्ध कार्रवाई प्रभावी तरीके से लागू होती है तो जनप्रतिनिधियों के पत्रों से जुड़े मामलों के निपटारे में तेजी आने की संभावना है।
कुल मिलाकर, 1 सितंबर से हिमाचल में लागू हुई यह व्यवस्था सांसदों-विधायकों के VIP संदर्भों को फाइलों की लंबी प्रक्रिया से निकालकर डिजिटल निगरानी के दायरे में लाने वाला बड़ा प्रशासनिक बदलाव है। अब किसी पत्र पर कार्रवाई हुई या नहीं, मामला किस स्तर पर है और जवाब कब दिया गया—इन सवालों का रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध रहेगा। यही वजह है कि आने वाले समय में जनप्रतिनिधियों के पत्रों को महीनों तक लंबित रखने की गुंजाइश पहले के मुकाबले काफी कम हो सकती है।



